अधूरी जानकारी के साथ निष्कर्ष: स्थान और परिस्थिति से अर्थ कैसे बदलता है
अधूरी जानकारी में ज्ञात बातों और खुले प्रश्नों को अलग रखते हुए सीमित निष्कर्ष लिखना उपयोगी है। स्थान और परिस्थिति से अर्थ कैसे बदलता है—चार संकेत, एक अभ्यास और जरूरी सीमा के साथ समझें।
बुनियादी बात
अधूरी जानकारी में ज्ञात बातों और खुले प्रश्नों को अलग रखते हुए सीमित निष्कर्ष लिखना उपयोगी है। इस भाग में विषय को “स्थान और परिस्थिति से अर्थ कैसे बदलता है” वाले सवाल से समझा गया है। चार संकेतों को साथ पढ़ने से किसी एक शब्द के आधार पर बहुत बड़ा निष्कर्ष निकालने से बचा जा सकता है।
संदर्भ को कथन के साथ रखें
किसी बात का अर्थ उसके स्थान और उपयोग की परिस्थिति से जुड़ा हो सकता है। “ज्ञात बात” पर एक छोटे स्थानीय विवरण और व्यापक परिचय में अलग जोर मिल सकता है। “खुला प्रश्न” का उल्लेख भी किस उद्देश्य से किया गया है, इसे समझना जरूरी है।
“सीमा” और “अगला प्रमाण” की जानकारी जोड़कर देखें कि शुरुआती अर्थ बदलता है या अधिक स्पष्ट होता है। संदर्भ का मतलब मनचाही छूट देना नहीं है। वह बताता है कि किन परिस्थितियों में कथन समझा गया है और किस नए संदर्भ में उसे दोबारा जाँचना पड़ेगा।
पढ़ने के चार संकेत
- ज्ञात बात: इस हिस्से में मुख्य बात क्या है, इसे एक वाक्य में दर्ज करें।
- खुला प्रश्न: पहले संकेत से इसका संबंध स्पष्ट है या अतिरिक्त संदर्भ चाहिए, यह पूछें।
- सीमा: इस हिस्से के लिए उपलब्ध आधार और अपनी व्याख्या को अलग रखें।
- अगला प्रमाण: कौन सी जरूरी शर्त या सीमा अभी बाकी है, उसे साफ लिखें।
छोटा अध्ययन अभ्यास
एक ही विषय को दो काल्पनिक परिस्थितियों में रखिए। दोनों में चार संकेतों की भूमिका लिखें। ऐसा सामान्य निष्कर्ष न बनाएं जो इन दोनों से बाहर की हर परिस्थिति पर बिना प्रमाण लागू हो।
एक जरूरी सीमा
अज्ञात हिस्से को कल्पना से भरना तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं है। इस सीमा के साथ विषय पर अपना निष्कर्ष पढ़ें। जहाँ जानकारी अधूरी हो वहाँ अज्ञात हिस्सा लिखना, उसे कल्पना से भरने से अधिक स्पष्ट तरीका है।
आगे पढ़ने के लिए
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